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लेखनी कहानी -12-Jan-2026

धुन्ध छाया है हवाओं में घुटन है।

दुख बहुत है आंसुओं का आचमन है।

आचरण में फैला भ्रष्टाचार अब।

अंधकारों का मगर जंगल सघन है।

चित्त उसका भी बहुत अशांत है।

कुछ नहीं है पास उसके सिर्फ धन है।

वो पथिक चलता रहा है सारा जीवन।

इस लिए अब उसके पैरों में थकन है।

उचित अनुचित सोच लो संसार में

ये परीक्षा कक्ष है जीवन मरण है।

मान लो बस वही व्यक्तित्व अच्छा।

जिसमें चिंतन और मनन है।

फूल जैसा उसका जीवन।

शूल की फिर भी चुभन है।

पूजनीय आचरण था कल तलक।

आज बस वो नाम का ही ब्राह्मण है।

है “सगीर” अब संस्कारों में पतन।

सभ्यताओं में हुआ कैसा हनन है।

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1 Comments

Pranav kayande

17-Jan-2026 01:18 PM

True

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